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चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-10


– लक्ष्मीनारायण भाला

लोकतांत्रिक मार्ग का सर्वाधिक महत्व का पड़ाव है, निर्वाचन। महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ यह पड़ाव नाजुक एवं संवेदनशील भी है। ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक अपने प्रतिनिधि चुनने की इस चयन प्रक्रिया को लोकतंत्र का महापर्व ही कहा जाएगा। कुल 22 भागों एवं 3 उपभागों में बटे अपने इस पवित्र संविधान के 15 वे भाग का मुख्य विषय निर्वाचन ही है। धारा 324 से 329 तक कुल छ: धाराओं में इसके नीति-नियम लिपिबद्ध किये हुए है। धारा 329 का (क) विस्तार संविधान के 44 वे संशोधन द्वारा निरसित कर दिया गया है।
निर्वाचन आयोग के गठन से लेकर निर्वाचन के परिणाम घोषित होने तक की पूरी प्रक्रिया में अधिकाधिक जन सहयोग हो, जन सहभाग बढ़े, जन जागरण हो एवं सामाजिक कार्यों में जनता सक्रिय बनी रहे यही संविधान निर्माताओं की आकांक्षा थी। उसी के अनुसार इन धाराओं में दिशा-निर्देश है। धारा 329 में निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों का हस्तक्षेप भी सीमित किया गया है। लोकतंत्र के इस प्रमुख आधार स्तंभ की स्वायत्तता का ध्यान रखा गया है।

चयन प्रक्रिया से संबंधित संविधान के इस 15 वे भाग के लिये चित्रों का चयन बहुत ही गरिमापूर्ण है। हम भारत के लोग अपने जनप्रतिनिधि या जननेता के चयन को किस कसौटी पर कसे इसका उत्कृष्ट उदाहरण ही इन चित्रों के चयन से स्पष्ट हुआ है। भारत के निकटतम इतिहास के उन दो महापुरूषों का संविधान निर्माताओं ने चयन किया है जिन्होंने अपने देश एवं धर्म के लिये पराक्रम एवं त्याग की पराकाष्ठा की थी। मुगल काल की समाप्ति एवं अंग्रेजों के आगमन की आहट के संधिकाल के कालखंड के जिन दो महापुरूषों का चयन इस भाग के लिये किया गया वे महापुरूष है छत्रपति शिवाजी महाराज एवं गुरु गोविंद सिंह।
ई. सन् 1630 से 1680 अर्थात केवल 50 वर्ष एवं ई. सन् 1666 से 1708 अर्थात केवल 42 वर्ष की आयु पाने वाले इन दोनों महापुरूषों के कुल 78 वर्ष की कालावधि (1630 से 1708) में 49 वर्ष अर्थात ई. सन् 1658 से 1707 तक औरंगजेब अपना साम्राज्य स्थापित करने में लगा हुआ था। अत्याचारों की पराकाष्ठा करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उल्लेखनीय है कि सर्वाधिक अत्याचारी बादशाहों में केवल 4 वर्ष तक राज करने वाले बाबर एवं 48 वर्ष तक राज करने वाले औरंगजेब का नाम सबसे ऊपर है। समय चाहे कम हो या ज्यादा दोनों के अत्याचारों की मात्रा कम नही थी। अयोध्या के राम मंदिर को तुड़वाकर उसे बाबरी मस्जिद कहने के लिये बाध्य करने वाला बाबर ही था। चित्रांकित दोनों महापुरूषों ने औरंगजेब के अत्याचारों को झेलते हुए भी जो प्रेरणादायी जीवन जिया था वह भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। यद्यपि यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जहां संविधान निर्माताओं ने औरंगजेब से लोहा लेने वाले दो श्रेष्ठ पुरूषों को संविधान के पृष्ठों पर सम्मान जनक स्थान दिया है वहीं भारत के संसद भवन की ओर जाने वाले जन प्रतिनिधियों को औरंगजेब मार्ग से होकर जाना पड़ता था। स्वाधीनता के 68 वर्ष बाद ही क्यों न हो उसे ए पी जे अब्दुल कलाम मार्ग नाम दिया गया यह हमारा सौभाग्य ही कहा जाएगा।
अपनी आयु के 12 वर्ष बाद से ही माता जीजाबाई से पायी शिक्षा-दीक्षा के कारण शिवाजी ने मुगलों से युद्ध करना प्रारंभ कर दिया था। उन्होंने ई. सन् 1674 में अपना राज्याभिषेक बड़ी धूम-धाम से करवा कर 44 वर्ष की आयु में यह स्थापित कर दिया कि जिसे काफिर कह कर राज करने योग्य नही मानते हो वह अब राजा बनेगा। गुरिल्ला युद्ध के द्वारा शत्रु को हतप्रभ करने से लेकर चतुराई के साथ बंदीगृह से सुरक्षित भाग जाने की योजना को क्रियान्वित करने का करतब शिवाजी महाराज ही कर सकते थे। राज सिंहासन पर बैठने के बाद भी समर्थ गुरु रामदास को राज सौंपकर उनके मार्गदर्शन में राज-काज करने की नम्रता और क्रूर सेनापति अफजल खान को आलिंगन कर बाघ नखों से मारने की उग्रता का समन्वय थे राजा शिवाजी। थल सेना के साथ-साथ नौ सेना को भी आधुनिकतम उपकरणों से सन्नद्ध कर विजय ही विजय है का विश्वास जगाने वाले शिवाजी अतुलनीय ही थे।
प्राय: 1600 ई. के प्रारंभ से ही भारत में व्यापार की संभावनाओं की खोज में पुर्तुगालियों और अंग्रेजों ने प्रवेश किया था। इन दोनों समूहों से व्यापारिक संधियां करने में भी शिवाजी महाराज अग्रणी थे। मुगलों से मुकाबला करना हो तो सभी छोटे-बड़े राजाओं को संगठित करना होगा यह उनका प्रयास था। इसी संदर्भ में राजा जयसिंह को फारसी भाषा में लिखा गया उनका पत्र एक ऐतिहासिक प्रसंग बन गया। गो-ब्राह्मण प्रतिपालक, हिन्दवी स्वराज्य संस्थापक, सफल रणनीतिकार, धुंरधर योद्धा आदि उपाधियों से सम्मानित छत्रपति शिवाजी महाराज आज भी कई प्रसंगों पर प्रेरक की भूमिका में उपस्थित होने का आभास कराते रहते है।
गुरु गोविंद सिंह गुरु नानक की परंपरा के दसवे गुरु थे। अपने पिता एवं अपने चारों बेटों को धर्म रक्षार्थ बलिदान होते हुए देखने वाले बेटे एवं पिता की मानसिक संवेदनाओं से जुझते हुए भी उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना का महान कार्य सम्पन्न किया। ‘‘सकल जगत में खालसा पंथ गाजे। जगे धर्म हिन्दु तुरक भंड भाजे।।’’ यह कह कर उन्होंने देश-धर्म की खातिर बलिदान देने के लिये तत्पर लोगों की मालिका खड़ी कर दी। गुरु परंपरा को नश्वर-देही मनुष्य से हटा कर शाश्वत स्वरूप में रहने वाले शब्दों को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करने का क्रांतिकारी कार्य उन्होंने किया। गुरु ग्रंथ साहब ही अब गुरु हैं। औरंगजेब को अत्याचारी मानसिकता से हटा कर मानवतावादी बनाने की आशा से उन्होंने फारसी भाषा में काव्य रचना की। 130 पदों का वह हलफनामा आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से उनकी एक श्रेष्ठ रचना है। औरंगजेब के पाशविक मन पर उस हलफनामें का कोई परिणाम हुआ था या नहीं यह कहना कठिन है परंतु गुरु ग्रंथ साहब में उन 130 पदों ने स्थान पाकर लाखों-करोड़ों को जीवन की दिशा दी है। भविष्य में भी देता रहेगा।
कश्मीर में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों पर किसी श्रेष्ठ व्यक्ति का मुखर होना जरूरी है, यह बात चर्चा में आयी तो बालक गोविंद सिंह ने पिता गुरु तेगबहादूर से सहज ही कह दिया था कि आप से श्रेष्ठ भला और कौन होगा। धर्मांतरण के विरोध में मुखर होने का अर्थ औरंगजेब के मृत्युदंड के फरमान से मुखातिब होना यह सभी जानते थे। वही हुआ। गुरु तेगबहादूर को चांदनी चौक पर शीश कटवाने की सजा सुनाई गयी। गुरु तेगबहादूर के बलिदान ने हिंदुओं को धर्मांतरित होने से रोका तथा उनका साहस बढ़ाया। इसी बलिदानी परंपरा का उच्चतम उदाहरण बन गये गुरु गोविंद सिंह के चारों पुत्र। अजीतसिंह और जुझार सिंह युद्ध में शहीद हुए तो जोरावर सिंह और फतेह सिंह को अत्याचारी औरंगजेब ने दीवार में ईंटों के बीच चुन देने की सजा सुना कर अपनी पाश्विकता को नंगा कर दिया। लोक प्रतिनिधियों के निर्वाचन का मापदंड देश एवं धर्म के लिये सर्वस्वार्पण की मानसिकता को ही माना जाना चाहिये यही वह संदेश है जो इन चित्रों के चयन के द्वारा संविधान निर्माता ‘हम भारत के लोगो’ को देना चाहते हैं।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं एएनएस समाचार के संरक्षक हैं

साभार चाणक्य वार्ता

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