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चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-11

– लक्ष्मीनारायण भाला

कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंधों से संबंधित नीति-नियमों का जिस भाग में उल्लेख दिया गया है उस 16वें भाग में धारा 330 से 342 अर्थात कुल 13 धाराएं समाहित है। विगत कई दशकों से विदेशी जातियों एवं जनजातियों की जो सूची बनायी गई थी उस सूची के अनुसार अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के विकास के लिये कुछ सुविधाओं का प्रावधान स्वाधीन भारत में आवश्यक था। ऐसी अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिये ही पूर्णत: समर्पित है संविधान का 16वां भाग। लोकसभा में स्थानों का आरक्षण, इस हेतु आयोग का गठन, अनुसूचितों, पिछड़े वर्गों की दशाओं की स्थिति जानने के लिये अन्वेषण आयोग का गठन, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की सूचियों का समय-समय पर पुनरावलोकन आदि का स्पष्टीकरण इस भाग का मुख्य विषय है। इनके साथ ही आंग्ल-भारतीय समुदाय का भी इसमें विशेष ध्यान दिया गया है।

इस भाग के लिये संविधान निर्माताओं ने जिन चित्रों का चयन किया है, उन पर गौर करें तो सौ वर्ष के अंतराल की दो विभूतियों का चयन किया गया है। दो महापुरुष छत्रपति शिवाजी एवं गुरु गोविंद सिंह का चयन करने के बाद 16वें भाग के लिये 17वीं एवं 18वीं शती के क्रमश: टीपू सुल्तान एवं झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का चयन एक विशेष संवाद एवं संकेत हमें देता है। उस संकेत को समझने के लिये पहले टीपू सुल्तान के कार्यकलापों को समझना होगा।
दक्षिण भारत में मैसूर राज्य के शासक के रुप में हम टीपू सुल्तान को देखते हैं, तो अन्य मुस्लिम शासकों की तुलना में जो अंतर दिखाई देता है, उसे भी जानना होगा। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से 33 कि.मी. की दूरी पर बसा देवनाहजी उसका जन्म स्थान था। पिता हैदर अली मैसूर राज्य के सेनापति थे। वे छल-बल एवं पराक्रम से वहां के शासक बने। हिन्दु बहुल राज्य के शासक होने के नाते हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करना उनकी रणनीति का ही भाग था। उसके पुत्र सुल्तान रुतेह अली खान जो कि कालांतर में टीपू सुल्तान के नाम से विख्यात हुआ, उसने 1782 से 1799 कुल 17 वर्ष तक शासन सम्हाला। कुछ मंदिरों को बर्तन एवं आर्थिक दान देकर हिंदुओं को संतुष्ट करना एवं अपनी सेना तथा राजनैतिक दांव-पेंचों से अंग्रेजों की कंपनी को चैन से राज न करने देना यही उसकी रणनीति थी। यद्यपि दूर दृष्टि का उसमें अभाव था परंतु त्वरित निर्णय एवं पराक्रम के बल पर उसने अपनी धाक जमा रखी थी। स्थान-स्थान पर मुस्लिम अधिकारियों की नियुक्ति कर उन्हें यह निर्देश दिये गये थे कि सभी हिंदुओं को इस्लामी दीक्षा दो। जो स्वेच्छा से मुसलमान न बने उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाओ, जो पुरुष इस प्रक्रिया का विरोध करे उसका कत्ल करवा दो। उनकी स्त्रियों को पकड़ कर उन्हें दासी बनाकर मुसलमानों में बांट दो।
ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि टीपू सुल्तान ने अपने राज्य में 5 लाख हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया। हजारों का कत्ल एवं हजारों महिलाओं का अपहरण करवाया। टीपू सुल्तान के राज्यकाल में लिखे कई पत्रों के हवाले से अंग्रेज लेखक विलियम किर्क पैट्रीक ने यह प्रमाणित किया है कि व्यापार के साथ सत्ता पाने की योजना से काम करने वाली ‘कंपनी सरकार’ के लिये मार्ग का रोड़ा बनने वाला टीपू सुल्तान कितना हिंदू विद्वेषी था। दक्षिण भारत के दक्षिणवार में आक्रमण कर मालावार को हिंदुविहीन करने में टीपू सुल्तान की महती भूमिका रही है। कालांतर में ऐसे ही धर्मपरिवर्तन के कारण मोपला मुसलमानों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होकर हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए। उपरोक्त नकारात्मक क्रियाकलापों से भरा टीपू सुल्तान का कार्यकाल संविधान निर्माताओं की नजरों में केवल एक ही कारण से सकारात्मक बन गया कि उसने अंग्रेजों का डटकर विरोध किया था। अपनी 48 वर्ष की आयु में 4 मई 1799 के दिन कर्नाटक के श्रीटंगपडऩा में अंग्रेजों द्वारा टीपू सुल्तान को बलपूर्वक मारा गया। उस समय के संदर्भ में यह कहा गया था कि अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते वह शहीद हो गये। वस्तुत: टीपू की मृत्यु के बाद ही दक्षिण भारत का बहुत बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के हाथ आ गया। 17वीं शती के अंतिम योद्धा के नाते संविधान के इस पृष्ठ पर उसे स्थान मिला।
भारत के इतिहास में 18वीं शती विविध संग्रामों, आंदोलनों, सुधारों एवं पराक्रमों की गाथाओं से भरी पड़ी है। 1757 के पलासी के युद्ध के बाद भारत में ब्रिटिश राज का सूत्रपात हुआ था और 18वीं शती के प्रारम्भ से ही शिक्षा एवं शासन तंत्र में उन्होंने अपनी धाक जमाना प्रारम्भ कर दिया था। इस भ्रम को बनाने में यद्यपि अंग्रेज सफल हो रहे थे कि वे भारत का विकास करेंगे। मुसलमान, विशेषकर मुगलों की तुलना में कई गुना बेहतर होने की बात भी उन्होंने स्थापित कर दी थी परन्तु उनके द्वारा भारत की संास्कृतिक जड़ों में म_ा डाला जा रहा है यह बात दूरदर्शी भारतीय मनीषियों की समझ में आने लगी थी। 1857 का स्वतंत्रता-समर उसी समझ से उभरी सोच का एक प्रमाण था। आपसी तालमेल के अभाव में यद्यपि वह पूरी मात्रा में सफल नहीं हो पाया था परन्तु उसने भविष्य के स्वाधीनता आंदोलन की नींव डाल दी थी। इस नींव को भरने के क्रमबद्ध प्रयास एवं गौरवशाली परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी थी झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई नेवालकर।
मेरोपंत तांबे एवं भागीरथीबाई की कन्या संतान मणिकर्णिका को मनु कह कर पुकारा जाता था। 19 नवम्बर 1835 को जन्मी मनु वाराणसी के संस्कारित वातावरण में पली-बढ़ी। पांच वर्ष की आयु में मां की मृत्यु हो जाने के कारण उनके पिता चिंतित थे। बाजीराव पेशवा के दरबार में वे एक बार मनु को साथ ले गये। बाजीराव ने मनु को स्नेहपूर्ण भाव से ‘छबीली’ कहकर अपने घर रख लिया। मनु की शिक्षा-दीक्षा उसी परिवेश में होने लगी। घुड़सवारी, तलवार, धनुषबाण एवं अक्षर ज्ञान के साथ साथ उसे आत्मगौरव, स्वाभिमान, आत्मविश्वास, धर्म परायणता, न्यायप्रियता आदि संस्कार मिलने लगे। केवल 8 वर्ष की आयु में ही मनु का विवाह झांसी के मराठा शासक गंगाधर नेवालकर के साथ हुआ। मराठी परंपरा के अनुसार मनु या मणिकर्णिका का नाम बदला गया। अब उसे ‘लक्ष्मी’ कहा जाने लगा। 17 वर्ष की आयु में उसे पुत्र प्राप्ति हुई। दुर्भाग्यवश दो वर्ष के भीतर ही पुत्र एवं पति दोनों का देहावसान होकर लक्ष्मी जो कि अब लक्ष्मीबाई कहलाने लगी थी असहाय सी हो गयी। ऐसी विपरीत स्थिति में राजकाज सम्हालने की चुनौती उसने स्वीकार की। अपने देवर के बेटे को दत्तक पुत्र के नाते गोद लेकर राज-काज चलाने लगी। इस बीच अंग्रेजों ने व्यापार के साथ साथ स्थान-स्थान पर अपनी सत्ता भी स्थापित कर ली थी। छोटी-छोटी रियासतों, राजघरानों को अपने अधीन करने की नीति प्रारम्भ कर दी थी। तदनुसार झांसी को भी अपने अधीन रहने हेतु उन्होंने कुछ शर्ते रखी। उन्होंने दत्तक पुत्र दामोदर को उत्तराधिकारी के रुप में स्वीकृति देने से मना किया। स्वाभिमानी लक्ष्मीबाई को यह स्वीकार नहीं था।
‘‘मैं झांसी नहीं दूंगी’’ ऐसी घोषणा कर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को ललकारा। तोपे सज्ज हुई, सैनिक तैनात हुए, अन्न भण्डार भर लिये गये और जैसे ही अंग्रेज सेनापति सर हयूज ने आक्रमण किया उसका प्रतिकार किले से किया जाने लगा। आठ दिन तक युद्ध चलता रहा। इसी बीच विश्वासघाती सरदार दुल्हा सिंह फिरंगियों के साथ मिल गया। विवश होकर रानी लक्ष्मीबाई को घोड़े पर सवार हो बेटे दामोदर को अपनी पीठ पर बांध कर नाम मात्र सेना के साथ किले से बाहर जाना पड़ा। अंग्रेजी सेना से बचते हुए कालपि तक पहुंचने के बाद एक नाले को पार न कर पाने के कारण वह घायल होकर गिर गयी। सैनिकों ने अंग्रेजों का मुकाबला करते हुए रानी को बाबा गंगादास की कुटिया तक पहुंचाया। 17 जून 1858 को उन्होंने अंतिम सांस ली। दत्तक पुत्र को अपनी छोटी सी उम्र में ही अपनी इस वीरांगना मां को अग्नि देनी पड़ी। मात्र 23 वर्ष की आयु में पराक्रमी रानी ने यह सिद्ध कर दिया कि कोई कितने वर्ष जिया यह नहीं बल्कि कैसे जिया यही बात किसी को अमर कर देती है। झांसी की रानी की महानता ने महान कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान को इतना प्रभावित किया कि ‘खूब लड़ी मर्दानी’ इस कविता ने उस कवियत्री को भी अमर बना दिया। बुंदेले हरबोलों के मँुह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। इस ध्रूव पद के बाद 5-5 पंक्तियों की अठारह कडिय़ों के अंतिम कड़ी में कवियत्री लिखती है—
‘‘जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जग रखेगा स्वतंत्रता अविनासी
होने चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फांसी,
हो मदमानी विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’’
संविधान निर्माताओं ने हम सब कृतज्ञ भारतवासियों की भावनाओं की कद्र करते हुए संविधान के 16वें भाग पर देश को अंग्रेजों के शासन से मुक्त करने के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के अप्रतिम शौर्य को उचित स्थान देकर सम्मानित किया है। टीपू सुल्तान से लक्ष्मीबाई तक प्राय: 80 वर्ष के अंतराल में मुगलों के शारीरिक अत्याचारों के अंतिम दौर एवं अंग्रेजों के बौद्धिक आक्रमण के प्रारम्भिक दौर से भारत गुजर रहा था। इन दोनों प्रहारों से जूझते हिन्दू राष्ट्र को जागृत रखने का संदेश देने वाले इन दो चित्रों का चयन अर्थपूर्ण है। टीपू सुल्तान के अनर्थ को जानना भी आवश्यक एवं अर्थपूर्ण है। साथ ही जिन विशेष वर्गों को इस भाग में अनुसूचित कर उनके लिये विशेष अनुबंधों का विवेचन किया गया है। उन वर्गों को मुख्य धारा से अलग करने में भी इस कालखंड की भूमिका अधिक रही है। अत: इस कालखंड का स्मरण अर्थपूर्ण है।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं एएनएस समाचार के संरक्षक हैं

साभार चाणक्य वार्ता

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