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चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-9

– लक्ष्मीनारायण भाला

भारत के संविधान की धारा 308 से 323 तक कुल 16 धाराएं भाग 14 में समाविष्ट की गई हैं। इसी भाग का विस्तार 14 (क) में धारा 323 के ही ‘क’ तथा ‘ख’ अंश को समाहित किया गया है। केन्द्र और राज्य के अधीन आने वाली सेवाएं इस भाग के प्रथम अध्याय में स्पष्ट की गई हैं। दूसरे अध्याय में धारा 315 से 323 तक लोक सेवा आयोग के गठन से लेकर राष्ट्रपति एवं राज्यपालों को वार्षिक प्रतिवेदन देने की प्रक्रिया तक के सभी कर्तव्यों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। 14 (क) में प्रशासकीय अधिकरण तो 14 (ख) में अन्य विषयों के लिये अधिकरणों के गठन एवं कर्तव्य आदि को स्पष्ट किया गया है।
केन्द्र (संघ) तथा राज्य के आपसी संबंधों में कई प्रकार के उतार-चढ़ावों का दौर भारतीय इतिहास में ई. सन् 1100 के बाद से लगातार 900 वर्षों तक चला आ रहा है। एक समय था जब अपनी सम्पन्नता व शैक्षिक उच्चता के कारण सोने की चिडिय़ा के रुप में भारत की ख्याति थी। विश्व के अन्य देशों का भारत की ओर आकर्षित होना बहुत ही स्वाभाविक था। इसी कालखंड में भारत में उपजी दो धाराएं, जैन एवं बौद्ध, अन्य देशों तक पहुंच चुकी थी। बौद्ध चिंतन एवं मतवाद को राजाश्रय भी मिला। परिणाम स्वरुप हिमालय से समुद्री तट तक के भूभाग की सीमा को लांघ कर हिमालय के उस पार एवं समुद्र के भीतर फैले छोटे-बड़े द्वीपों तक बौद्ध मत का विस्तार होकर भारत की कीर्ति फैलने लगी। चीन भी इस चिंतन से प्रभावित हुआ। आधी आबादी ने तो बौद्ध मत भी स्वीकार कर लिया।
इधर पश्चिम की ओर ईसाई मतवाद फैल रहा था। ईसा मसीह के प्राय 500 साल बाद एक और ताकत उभरी। हजरत मोहम्मद ने अपने कबीले में सत्ता की आकांक्षा जगाकर अपने मतवाद को इस्लाम कहलाकर विस्तारवादी नीति अपनाई। ईसाई और इस्लाम अपने-अपने तरीके से अपना-अपना विस्तार करने लगे। राजाश्रय प्राप्त करते हुए बढऩा यही उनकी नीति थी। ईसाइयों ने बुद्धि के सहारे तो इस्लाम ने बल के सहारे अपना-अपना विस्तार किया। भारत में पहले इस्लाम ने कदम रखे। समुद्री मार्ग से केरल की ओर तो भूमार्ग से कंदहार, जिसे अब अफगानिस्तान कहा जाता है,की ओर उन्होंने आक्रमण किया। एक के बाद एक कबिला भारत पर अपना अधिकार जमा कर इसे लूटने की लालसा से आने लगा। सन् 1193 से 1290 तक गुलाम वंश के कबीलो ने बार-बार आक्रमण कर कुछ रजवाड़ों पर अपनी रियासत कायम की। लगातार 97 वर्ष तक 13 सुलतान इस काम में लगे रहे जिनमें एक महिला रजिया सुलताना भी थी। फिर खिलजी वंश के 7 मुखियाओं ने 30 वर्ष (1290 से 1320 ई. तक) प्रयास किया। उसके बाद तुगलक वंश के 11 प्रमुखों ने 94 वर्ष तक अपने पैर जमाने की कोशिश की। सैयद वंश के चार प्रमुखों ने सन् 1414 से 1451 अर्थात 37 वर्ष तक प्रयास किया। लोदी वंश के तीन प्रमुखों के 75 वर्षों (1451 से 1526 ई.) तक प्रयास करने के बाद मुगल वंश के दो प्रमुखों बाबर और हुमायुं ने 13 वर्ष तक अपनी ताकत दिखाई। सूरी वंश के शेरशाह सूरी और सिकंदर के द्वारा 16 वर्ष तक सत्ता हथियाने के प्रयास करने के बाद पुन: हुमायु से लेकर बहादुर शाह जफर तक कुल 17 प्रमुखों ने इस सोने की चिडिय़ा को नोचने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सब ने भारत को भोगभूमि के रुप में ही देखा था। वे तलवार और सत्ता के बल पर धर्मांतरण भी करते रहे। भारत के इतिहास का सर्वाधिक उत्पीडऩ का कालखंड रहा है यह मुस्लिम कालखंड। भारत की उदारता एवं सहनशीलता का लाभ उठाकर मंदिरों को तोडऩे से लेकर नारियों का शीलहरण करना उनके लिये आम बात थी।
ईस्वी कालगणना एवं हिजरी कालगणना में एक वर्ष क्रमश: 365-366 और 354-355 दिन का होता है अर्थात् एक वर्ष में 11 दिन का अंतर है। यही कारण है कि 1193 से 1857 ईस्वी के 664 वर्ष की तुलना में यही कालखंड हिजरी के 724 वर्ष बनते हैं। इस लम्बी कालावधी में 7 वंश के 64 शासकों ने भारत के किसी न किसी भू-भाग पर शासन किया। संविधान निर्माताओं ने सकारात्मक सोच की मानसिकता होने के कारण इस कालखण्ड में भी किसी की कुछ अच्छाइयों को खोजने का प्रयास किया। अंधों में काना राजा की तर्ज पर कम से कम 20 वर्ष से 50 वर्ष तक जिन्होंने राजकाज सम्हाला हो ऐसे 17 शासकों का इतिहास खंगाला गया। इनमें 49 वर्ष तक शासन करने वाला (1556 से 1605 ईस्वी तक) अकबर ही केवल ऐसा एक शासक दिखाई दिया जिसने औरों की तुलना में कुछ कम अत्याचार किये हो।

अकबर के सत्तासीन होने से पूर्व ईस्वी सन् 1508 से 1529 तक उत्तर और दक्षिण भारत में क्रमश: उदयपुर के राणा सांगा और विजयवाड़ा के राजा कृष्णदेव राय ने लोदी वंश के मुस्लिम शासको का कड़ा मुकाबला किया था। उन मुस्लिम शासकों ने इस्लाम की साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण करते हुए गैर इस्लामी समाज को काफिर होने के कारण राज करने का अधिकार नही है यह धारणा थोप दी थी। हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया गया था। हिन्दु समाज हीन भावना से ग्रस्त होकर आत्मविश्वास तथा आत्मगौरव खोने लगा था। भारतीय मूल के सभी मत-पंथों के पुरोधाओं ने भक्ति आंदोलन के सहारे अपने अस्तित्व एवं गौरव को बनाएं रखने का प्रयास प्रारंभ कर दिया था ऐसे विपरीत समय में काफिर कहलाने वाले उपरोक्त दोनों राजाओं ने अपना-अपना राज्याभिषेक करवा कर हिन्दुओं के मनोबल को बढ़ाने का सफल प्रयास किया था। यही कारण था कि अकबर के अत्याचारों की मात्रा पूर्ववर्ती शासकों की तुलना में कम थी ऐसा माना जा सकता है।
यह उल्लेखनीय बात है कि सर्वाधिक अत्याचारी की सूची में 48 वर्ष तक राज करने वाला औरंगजेब एवं केवल 4 वर्ष तक राज करने वाला बाबर गिना जाता है। स्पष्ट है कि समय चाहे कम मिला हो परंतु अत्याचारों की मात्रा कम नहीं थी। अयोध्या के राममंदिर को बाबरी मस्जिद कहने पर मजबूर करने वाला बाबर ही था।
अकबर के अत्याचारों की मात्रा इन 64 शासकों में सबसे कम थी। संभवत:यही कारण है कि संविधान के भाग 14 एवं 14 (क) के लिए अकबर के दरबार का चित्र चयनित किया गया हो। केन्द्र के साथ राजे-रजवाड़ों का संबंध मधुर रखने हेतु अकबर ने आपसी संवाद एवं विवाह संबंधों का रास्ता अपनाया था। यह उसकी रणनीति का हिस्सा मात्र था। उसके दरबार के नौ रत्नों में राजा मानसिंह सेनापति की भूमिका में, राजा टोडरमल राजस्व मंत्री के रूप में एवं राजा बीरबल सलाहकार के रूप में कार्यरत थे। तानसेन एक संगीतज्ञ, अबुल फजल दरबारी लेखक, फैजी उनके बच्चों के शिक्षक, अबुल रहीम खानेखाना दरबारी कवि तथा फकिर अजियोदीन और मुल्लाह हो पियाजा उनके राजनैतिक सलाहकार थे। बादशाह होते हुए भी कुछ मात्रा में लोकतांत्रिक तरीकों से काम करने के कारण अकबर के दरबार का यह चित्र संविधान के पृष्ठ पर स्थान पा सका है।
संविधान निर्माताओं का संदेश स्पष्ट है कि मुगलकाल का भी वही बादशाह हमें स्वीकार्य है जो लोकतंत्र, कला, संस्कृति एवं केन्द्र तथा राज्य के आपसी संबंधों में सामंजस्यपूर्ण वातावरण बना पाया हो। अंधों में काना ही क्यों न हो पर अकबर इस कसौटी पर कुछ मात्रा में खरा उतरता है, ऐसा संविधान निर्माताओं ने मान लिया है। अकबर के दरबार का यह चित्र यही संदेश देता है कि उदार मनोभाव से ही लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को संचालित किया जा सकता है।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं एएनएस समाचार के संरक्षक हैं

साभार चाणक्य वार्ता

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