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चैत्र शुक्ल चतुर्दशी हाटकेश जयंती

अजय नागर

गुजराती नागर ब्राह्मणों का मुख्य त्योहार है हाटकेश्वर जयंती। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को हर वर्ष मनाया जाता है। कहते हैं कि हाटक प्रदेश ( वर्तमान में माउंट आबू के पास) में भगवान शंकर की नागर ब्राह्मणों की तपस्या से प्रकट हुए थे जब से भगवान महादेव का दूसरा नाम हाटकेश्वर पड़ा, हाटक स्वर्ण को भी कहते हैं, स्वर्ण रूपी महादेव लिंग को हाटकेश्वर के रूप में पूजा जाता है । गुजराती मूल होने के कारण वडनगर, विसनगर और प्रश्नगर में भी हाटकेश्वर मंदिर स्थित है।

जहां जहां नागर, वहां वहाँ मनाई जाती है हाटकेश जयंती।


जहां तक राजस्थान की बात हैं, प्रदेश के जयपुर, बांसवाड़ा, दौसा, कोटा , बूंदी , उदयपुर , डूंगरपुर में नागर समाज के लोगों की संख्या बहुतायत में हैं। इसके अलावा राज्य के अन्य हिस्सों में भी नागर समाज के लोग काम और व्यापार के सिलसिले में फैले हुए हैं। गुजरात के वड़नगर में हाटकेश्वर मंंदिर के अलावा पूरे देश में जहां-जहां नागर समाज के हाटकेश्वर मंदिर हैं वहां हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हाटकेश्वर जयंती पर भगवान शिव की आराधना होती है। वडनगर के मुख्य मंदिर के प्रति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी अटूट श्रद्दा है। वे भी वडनगर के ही मूल निवासी हैं इसलिए जब भी समय मिलता है वे वहां पूजा के लिए पहुंचते हैं। राजस्थान समेत सभी जगहों पर हाटकेश्वर मंदिर में हाटकेश्वर जयंती के दिन समाज के लोग एकत्र होकर शिव आराधना करते हैं उसके बाद न्यात ( परंपरागत गुजराती भोजन प्रसादी) होती हैं।

शिव ने उमा से विवाह के लिए उत्पन्न किया था नागरों को

माना जाता है कि नागर, ब्राह्मणों के सबसे पुराने समूह में से एक है। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि नागरों का मूल आर्य है। वे दक्षिण यूरोप और मध्य एशिया से भारत आए हैं। वे हिंदू कुश के माध्यम से या तो त्रिवेट्टापा या तिब्बत चले गए। बाद में कश्मीर होते हुए कुरुक्षेत्र के आसपास आकर बस गए। नागर या नागर ब्राहमण भारतीय मूल के धर्मो में वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मणो की एक ज्ञाति है। नागरो को ब्राह्मणो में सब से श्रेष्ठ माना जाता है। भारत में गुजरात, काश्मीर, मध्यप्रदेश इत्यादि राज्यो में नागर समुदाय की बस्ती ज्यादा है। नागर समुदाय के लोग कलम, कड़छी और बरछी में निपुण होते है एसा माना जाता है। नागरो के बारे में वेद व्यास द्वारा लिखित स्कन्दपुराण के नागरखंड में प्राचीन उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार भगवान शिव ने उमा से विवाह के लिए नागरों को उत्पन्न किया था तथा इसके पश्चात प्रसन्न होकर उत्सव मनाने के लिए इन्हें हाटकेश्वर नाम का स्थान वरदान के रूप में दिया था।
राजा चमत्कार का उपहार किंवदंती है कि अपने जीवन को बचाने के लिए गुजरात के एक राजा चमत्कार ने ब्राह्मणों के लिए उपहार स्वरूप एक नगर बसा दिया। कथा के अनुसार, एक दिन राजा शिकार के लिए निकला। एक हिरणी अपने बच्चे को स्तनपान करा रही थी। राजा ने उस हिरणी के बच्चे को मार दिया। हिरण ने राजा को शाप दिया जिसके परिणाम स्वरूप राजा के शरीर पर सफेद दाग हो गए तथा वह बीमार पड़ गया। उसी क्षेत्र में ब्राह्मणों का एक छोटा सा गांव था। वहां के ब्राह्मणों ने जड़ी-बूटियों द्वारा राजा को पुन: स्वस्थ कर दिया। राजा ने उन ब्राह्मणों का आभार माना और उपहार स्वरूप उन्हें धन व जमीन देने का प्रस्ताव दिया, परन्तु उच्च सिद्धांतों वाले उन ब्राह्मणों ने इसे अस्वीकार कर दिया। बाद में रानी ने उस गांव में आकर उन ब्राह्मणों की पत्नियों से धन व जमीन लेने का अनुरोध किया। रानी के बहुत निवेदन करने पर 72 स्त्रियों में से 68 स्त्रियों ने इसे स्वीकार कर लिया। जो ब्राह्मण परिवार राजा द्वारा दिए इस नगर में रहे, नगर में रहने के कारण वे ब्राह्मण नागर कहलाने लगे। कुछ ब्राह्मण नगर से बाहर अपने आश्रमों में ही रहे। वे बाह्यनागर कहलाये। समयानुसार इस नगर के कई नाम बदले। यह मदनपुर, स्कंदपुर, अनंतपुर, आनंदपुर, वृद्धनगर और वडनगर नाम से जाना गया। वर्तमान में यह वड़नगरके रूप में जाना जाता है।

कई पुस्तकों, पुराण व इतिहास में उल्लेख प्रसिद्ध विद्वान वराह मिहिर ने अपनी पुस्तक बृहद संहिता में नागरों का उल्लेख किया है कि नागर विक्रम सम्वत के प्रारम्भ में भी मौजूद थे। इससे ज्ञात होता है कि नागर ब्राह्मण विक्रम सम्वत से पहले भी अस्तित्व में थे। एक सबसे पुराना धार्मिक ग्रन्थ स्कंद पुराण उपलब्ध है, जो कि नागर समुदाय की उत्पत्ति और विकास का वर्णन करता है। स्कंद पुराण में एक विस्तृत और एक स्वतंत्र नाग-खण्ड है जो कि नागर समुदाय के विकास का स्पष्ट रूप से वर्णन करता है। क्रथा नामक एक ब्राह्मण था जो देवरत का पुत्र था। उसका स्वभाव बड़े होते-होते क्रूर हो गया। एक बार वह जंगल में जाने पर नाग-तीर्थ नामक स्थान पर पहुंचा जहां नाग (सर्प) एक साथ रहते थे। उस समय नाग राजा के राजकुमार रुद्रमल अपनी मां के साथ नगर में टहलने के लिए आये थे। क्रथा का रुद्रमल के साथ आमना-सामना हुआ तो क्रथा ने रुद्रमल को एक साधारण नाग समझकर मार डाला। रुद्रमल ने क्रथा से बहुत विनती की मैं निर्दोष हूं फिर भी आप मुझे क्यों मार रहे हैं। रुद्रमल की इंसानी आवाज सुनकर क्रथा चकित हो गया और डरकर वहां से भाग गया। रुद्रमल की मां यह देखकर बेहोश हो गई और जब वह होश में आई तो बहुत रोयी। वह जल्द ही अपने पति के पास गई और पूरी घटना सुनाई। पूरे नाग समुदाय वहां इकट्ठे हुए और रुद्रमल के शरीर का अंतिम संस्कार किया। उसके पिता ने यह शपथ की कि जब तक वह हत्यारे के पूरे परिवार को नष्ट न कर दे तब तक वह अपने दिवंगत पुत्र को अंतिम श्रद्धांजलि नहीं देगा। उन्होंने अपने पूरे समुदाय के सदस्यों को अपराधी का पता लगाने का आदेश दिया और निर्देश दिया कि श्री हाटकेश्वर तीर्थ जाकर के सभी परिवार के सदस्यों को मार डालें। इस प्रकार, सभी नाग नागरिक चमत्कारपुर गए, और क्रथा के परिवार और रिश्तेदारों के घरों पर हमला करके आतंक फैलाया। इन सभी आतंकियों से खुद को बचाने के लिए सभी ब्राह्मण परिवार वन में चले गए। नाग राजा ने तब अपने दिवंगत पुत्र को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की। ब्राह्मण जंगलों में कब तक रह पाते ? उन सभी ब्राह्मणों ने त्रिजट नाम के एक बड़े संत के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें पूरी कहानी सुनाई। त्रिजट को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त था। ब्राह्मणों को ऐसी दीन दशा में देखकर त्रिजट ने भगवान शिव की पूजा की और ब्राह्मणों की रक्षा करने के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव प्रसन्न हुए। भगवान शिव ने कहा कि वह नाग समुदाय को नष्ट नहीं कर सकते। हालांकि, वे उन में निहित जहर को समाप्त कर सकते हैं। इसके लिए, भगवान शिव ने एक मंत्र दिया। जब इन ब्राह्मणों ,ना-गर, (विष नहीं) मंत्रोच्चारण के साथ अपने घरों में प्रवेश किया तब तक वे काफी वृद्ध हो चुके थे। इसलिए, शहर को वृद्धनगर के रूप में जाना जाने लगा। जो बाद में बदलकर वडनगर हो गया।
भगवान शिव की पूजा में नाक के उच्चतम स्थान पर खड़ा होने वाला समुदाय को नाकर के रूप में जाना जाता था जो नागर के रूप में लोकप्रिय हुआ।

कुछ अन्य धारणाएं

यह भी एक धारणा है कि भारत के पश्चिमी भाग में शकों और यवनों के आक्रमण के बाद सौराष्ट्र में कई छोटे राज्य स्थापित किए गए थे। विदेशियों के आक्रमण से खुद को बचाने के लिए ब्राह्मणों ने वनों के एकान्त स्थानों को छोड़ दिया और राज्य के राजाओं के आश्रय के तहत नगरों में रहना शुरू कर दिया था। और इस कारण उन ब्राह्मणों को नागर के नाम से जाना जाने लगा। यह भी माना जाता है कि गुजरात आने से पहले नागर सिंध में रहते थे। डॉ.भंडारकर भी यह मानते हैं कि नागरों का जन्म हमारे देश के बाहर हुआ है। सीमा पार से नागर पहले कश्मीर आए और फिर वे राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बंगाल, मालवा और गुजरात राज्यों में फैले। कुरुक्षेत्र से पलायन करने के बाद वे पहले आज के आनंदपुर-वडनगर में बस गए थे।
एक धारणा नागरों के मूलत: ग्रीक होने की है। जब सिकंदर ने भारत पर हमला किया, वह कश्मीर के माध्यम से अपनी सेना के साथ आए थे। लौटने पर, कई यूनानी सैनिक कश्मीर में बसे थे। वे कश्मीर के पंडित समुदाय के निकट संपर्क में आए और जिसके परिणामस्वरूप नागरों का जन्म हुआ। बाद में वे देश के अन्य हिस्सों में चले गए। नागरों और यूनानियों को आज भी बुद्धिमता व शारीरिक बनावट के तौर पर समान माना जाता है।
जब महाभारतकाल में पाण्डव वनवास के समय पूरे देश में घूम रहे थे तब एक बार अर्जुन असम पहुंचा। वहां नाग वंश का शासन था। वह नाग राजा की बेटी उलूपी के संपर्क में आया। वे करीब 2 साल तक एक साथ रहे। बाद में अर्जुन ने असम छोड़ दिया। उलूपी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम बभ्रूवाहन रखा गया । समय बीत गया। पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। असम के अलावा देश में कहीं भी यज्ञ के घोड़े को पकड़ने का साहस नहीं हुआ। अर्जुन की सेना और बभ्रुवाहन की सेना में भीषण युद्ध हुआ जिसमें भारी जनहानि हुई। अर्जुन को भी बभ्रुवाहन ने मार दिया। बभ्रुवाहन ने अपनी मां उलूपी को अपनी जीत की खबर तथा अर्जुन की हत्या के बारे में बताया। उलूपी खबर की पुष्टि करने के लिए युद्ध के मैदान में आयी और अर्जुन की मृत्यु से अत्यन्त दु:खी हुई। उसने बभ्रुवाहन से कहा कि अर्जुन तुम्हारे पिता थे। तब दोनों ने अर्जुन को पुन: जीवित बनाने का फैसला किया। बहुत पहले उलूपी के पिता ने भगवान शिव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था तथा भगवान शिव से जीवन-बचाने वाली दवा संजीवम प्राप्त की थी। उलूपी ने बभ्रुवाहन को बताया कि अगर वह भी इसी तरह तपस्या करता है तो वह भी इस जीवन-रक्षक दवा को प्राप्त कर सकता है। बभ्रुवाहन ने ऐसा किया तथा दवा प्राप्त कर अर्जुन को पुन: जीवित कर दिया। सभी नगर में एक साथ वापस आये। बभ्रुवाहन के नाना नाग राजवंश के प्रमुख थे और उनका नाम हाटक था। इसलिए हाटक के देवता हाटकेश्वर के नाम से जाने जाते थे। जिस शिवलिंग के समक्ष हाटक तथा बभ्रुवाहन ने तपस्या की थी, वे हाटकेश्वर कहलाये।

साहित्यकारोंं का नजरिया

प्रसिद्ध नागर साहित्यकार रमनलाल वसंतलाल देसाई के अनुसार मेवाड़ के प्रथम पुरुष बप्पा रावल एक नागर थे। उनका यह भी मानना है कि कुछ नागर ईरान से आए और गुजरात में बस गए। यह इस दृष्टिकोण को सही ठहराता है कि भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में नागर मूल रूप से गुजरात से हैं। जुनागढ़ के एक प्रसिद्ध इतिहासकार और एक प्रसिद्ध नागर शंभूप्रसाद देसाई ने नागर के इतिहास के बारे में अपनी पुस्तक में उल्लेख किया था कि, नागर पहले ग्रीस, मैसेडोनिया, सीरिया या इन जगहों के आस-पास के क्षेत्र से आए थे। जॉर्डन और इजराइल के पास एक नागर नामक क्षेत्र है। इसके अलावा ईरान में एक नागर समुदाय भी है, जो बुद्धिमान और अच्छे और कुशल प्रशासकों के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे वहां से पहले कांगड़ा (पहले नगरकोट) हिमालय के लिए आए होंगे। नग का अर्थ पर्वत है। और नाग का अर्थ है पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति।

कुलदेवता हाटकेश्वर महादेव

ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड के अनुसार नगर ब्राह्मण समाज के कुलदेवता हाटकेश्वर महादेव हैं जो गुजरात में शंखतीर्थ के पास वड़नगर में विराजित है। पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्माजी ने हाटक (स्वर्ण) से शिवलिंग बनाकर उसका पूजन किया और हाटकेश्वर तीर्थस्थल स्थापित किया। उन्होंने गुजरात के उस क्षेत्र के ब्राह्मणों को हाटकेश्वर महादेव की पूजा की प्रेरणा दी

नागर ब्राह्मणों के आठ अवंटक

ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड में नागरों के आठ अवंटक बताये गए हैं। ये आठ अवंटक हैं दवे दवे पंचक मेता तलखा पंड्या भूधर अनाम बास मोढासा के जानि

नागरों के उपनाम

कुछ प्रसिद्ध नागर उपनामों को अपने इतिहास और मूल के साथ दिया जा रहा है। हालांकि जानकारी को बहुत विश्वसनीय स्रोतों से लिया गया है और इसे प्रामाणिक माना जा सकता है, लेकिन इतिहास बहुत बड़ा है इसलिए त्रुटियों की भी सम्भावना है।

जयपुर हटकेश्वर मंदिर

जयपुर की बसावट के समय जयपुर के महाराज जयसिंह जी ने भूमि शुद्धि एवम हवन, यज्ञ कार्य के लिए गुजरात के नागर ब्राह्मणों बुलाया था। सम्पूर्ण ब्रह्मपुरी क्षेत्र, नागर पाड़ा क्षेत्र में उनको मकान बना के दिए और वहीं उनके कुल देव श्री हाटकेश्वर महादेव का मंदिर भी बना कर दिया। हाटकेश्वर महादेव की दोनों समय पितांबर (मुकटा) पहन कर पूजा की जाती है और भगवान हाटकेश को श्रीखंड और कचोरी का भोग लगाया जाता हैं। दूसरे समय मिश्री मावा, पतासे, दही और इलायची दाने प्रसाद का भोग लगाया जाता है।

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