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ज्ञान की परम्परा और विशेषता से हम दूर जयंत सहस्रबुद्धे

जयपुर। देश में ज्ञान की परम्परा और विशेषता से हम दूर चले गये। आश्चर्यजनक प्रभाव से अपने देश से ज्यादा पश्चिम को श्रेष्ठ मानने लगे हैं। ये विचार आज विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री जयंत सहस्रबुद्धे ने पाथेय कण सभागार में रज्जू भैया स्मृति व्याख्यानामाला के प्रथम पुष्प में व्यक्त किये।


उन्होंने बताया कि अपने देश में विज्ञान क्या था, हमको विज्ञान में तंत्र ज्ञान, यंत्र ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान का आधुनिक क्षेत्र में विकास के अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने दिल्ली के कुतुबमीनार के पास लौह स्तम्भ का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत के विज्ञान के अभाव में उसका निर्माण सम्भव नही था।


उन्होंने आगे बताया कि लौह स्तम्भ के बारे में डा. बाल सुब्रमण्यम ने रसायन विज्ञान का अध्ययन किया उसके साथ ही उसका मापन विज्ञान का अध्ययन किया जिसे वर्तमान में मेट्रोलोजी विज्ञान कहते हैं। हमारे यहाँ एक हाथ या चार उंगल इस प्रकार से मापन किया जाता था, जिसके प्रमाण को नकार दिया गया।


उन्होंने कहा कि भारत में मापन शास्त्र अचूक है जिसका कॉटिल्य अर्थशास्त्र में वर्णन किया गया है। उन्होंने कहा कि विश्व धर्म सभा में भी स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में 11 सितम्बर 1892 की सभा में विज्ञान में भौतिक विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म विज्ञान के बारे में भी विश्व के सामने अपने विचार रखे। आधुनिक विज्ञान का सिद्धान्त, विज्ञान का प्रतिबिम्ब मात्र है,। भौतिक विज्ञान का विभाजन हुआ विद्युत, चुम्बकीय, परमाणु तीवर-मंद एवं गुरुत्वीय।
उन्होंने बताया कि भगवान नटराज की मूर्ति चक्रीय ब्रह्माण्ड के बारे में बताती है। नटराज की मूर्ति से ताण्डव नृत्य उत्पन्न हुआ अर्थात नृत्य के राजा थे। कृष्ण को नटवर कहा है, और भगवान शंकर को नटराज कहा जाता है।


उन्होंने यह भी कहा की मानव ऐसा विचार करने लगा है। यंत्र को मनुष्यत्व देना, जैसे शब्दों का भाव, भाषा का ज्ञान, चेतना आदि। मनुष्य स्वभाव से यंत्र बन रहा है। यंत्र के लिए उपर्युक्त भाषा संस्कृति है।


विशिष्ट अतिथि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के पूर्व वैज्ञानिक डा. जगदीश चन्द्र व्यास ने बताया कि भारत में विज्ञान विषय में धर्म एवं विज्ञान का टकराव नहीं है जबकि पश्चिम में कहा जाता है कि धर्म और विज्ञान का कभी साथ नहीं हो सकता। अध्यात्म एवं विज्ञान भारत की संस्कृति में आरम्भ से ही रहा है। अद्वैत रामायण में विज्ञान को परिभाषित किया गया है। हम स्वयं भी अपनी आंखो के सामने प्रमाणित होते हुए देख सकते हैं।


कार्यक्रम के आरम्भ में पाथेय कण के सम्पादक कन्हैयालाल चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ संघचालक रज्जू भैया के बारे में बताते हुए कहा कि उनका जीवन प्रेरणादायी था। आपातकाल के समय रूप बदलते हुए उन्होंने भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन किया।


कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे योगी रमणनाथ जी ने कहा कि भौतिकी के साथ अध्यात्म का संगम होने पर परिणाम जयादा सकारात्मक होंगे। कार्यक्रम से पूर्व दोपहर में प्राचीन भारत का विज्ञान विषय पर पोस्टर प्रदर्शनी रखी गई जिसमें विज्ञान विषय के विद्यार्थियों ने भाग लिया सर्वश्रेष्ठ पोस्टर बनाने वाले विद्यार्थियों को पारितोषिक दिया गया।


कार्यक्रम में प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ की भतीजी साधना सिंह भी उपस्थित रही। इनके साथ ही संघ के कार्यकर्ता, जयपुर सांसद एवं गणमान्य नागरिक भी उपस्थित रहे।


इस मौके पर प्राचीन भारत का विज्ञान विशेषांक एवं काव्य भौतिकी पुस्तक का अतिथियों द्वारा लोकार्पण किया गया।

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