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मातृभूमि की रक्षा के लिये दहकती मणिकर्णिका


• विनोद नागर
भारत में स्वाधीनता संग्राम की अलख जगाने वाले रणबाँकुरों की शौर्यगाथा रुपहले परदे पर हर दौर में दिखाई जाती रही है. वीरांगना लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, मंगल पांडे से लेकर असंख्य गुमनाम शहीदों ने अंग्रेजी हुकूमत से देश को आज़ाद कराने की चिंगारी फूंकी थी, उसका अहसास दर्शकों को देशभक्ति की अनेक फ़िल्में करा चुकी हैं. श्वेत-श्याम फिल्मों के युग में सोहराब मोदी ने अपनी निर्माण संस्था मिनर्वा मूवीटोन के बैनर तले देश की पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘झांसी की रानी’ 1953 में बनाई थी. केन्द्रीय भूमिका मोदी की पत्नी मेहताब ने तथा राजगुरु का रोल खुद सोहराब मोदी ने निभाया था. फिल्म को रंगीन स्वरुप देने की तकनीक और युद्ध दृश्यों पर भारी धन खर्च किये जाने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर इसका बुरा हश्र हुआ था. उस ज़माने के पारखियों ने उम्र के हिसाब मेहताब को रानी लक्ष्मीबाई के रोल के लिये मिसफिट बताया था. इस नाकामयाबी के बाद खुद मेहताब ने भी फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था.
बहरहाल इस शुक्रवार प्रदर्शित कंगना रनौत अभिनीत एवं निर्देशित ‘मणिकर्णिका: झांसी की रानी’ एक दर्शनीय फिल्म के रूप में मातृभूमि की रक्षा के लिये प्राणों का बलिदान करने वाली वीरांगना की अमर कहानी से रूबरू कराती ‘नई कविता’ जैसी है. यूँ कहें कि जन जन की जुबान पर चढ़ी सुभद्राकुमारी चौहान की उसी अद्भुत काव्य रचना का उत्कृष्ट सिनेमाई संस्करण है, जिसने पाठ्य पुस्तकों से रटी ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ जैसी ओजस्वी पंक्तियाँ स्वतंत्र भारत में जन्मी कई पीढ़ियों के मानस पटल पर हमेशा लिये पहले ही अंकित कर दी है. इस लिहाज़ से गणतंत्र दिवस पर ‘मणिकर्णिका’ देखना हर उम्र के दर्शकों के लिये भारत के गौरवशाली अतीत के पन्ने पलटने तथा महिला सशक्तिकरण की यथार्थ अनुभूति कराता है.
फिल्म का कलेवर, कसी हुई पटकथा तथा चुस्त संपादन जरा भी अहसास नहीं कराते कि कितनी मुश्किलों के भंवर में उलझकर यह फिल्म दर्शकों तक पहुंची है. गौर तलब है कि तेलुगु फिल्मों के स्थापित निर्देशक कृष (पूरा नाम राधाकृष्ण जगरलामुडी) ने विवादों के चलते जब यह फिल्म बीच में ही अधूरी छोड़ दी थी तब कंगना ने अभिनय के साथ निर्देशन की बागडोर कुशलतापूर्वक सम्हाली. इसीलिए निर्माताओं ने नामावली में निर्देशक के बतौर कंगना का नाम कृष से पहले देकर नारी शक्ति का सच्चा सम्मान किया है. फिल्म के लेखक विजयेन्द्र प्रसाद (बाहुबली के निर्देशक एस एस राजामौली के पिताश्री) ने एक बार फिर साबित किया है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली फिल्मो की कथा-पटकथा लिखने के मामले में उनका कोई सानी नहीं. फिल्म की भव्य निर्माण शैली बाजीराव मस्तानी और बाहुबली की याद दिलाती है. मध्यप्रदेश में नर्मदा किनारे महेश्वर के घाटों तथा ग्वालियर किले का मोहक फिल्मांकन लुभाता है. फिल्म को पहले दिन दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिलना सुखद व उत्साहवर्धक है.
फिल्म की कहानी मनु (कंगना रनौत) के विवाहित होकर रानी लक्ष्मीबाई बनने तथा कालान्तर में झांसी की रानी बनकर मात्रभूमि की रक्षा के लिये प्राणोत्सर्ग करने से जुड़ी दन्त कथाओं का नाट्य रूपांतरण है. मनु के साहसी, बुद्धिमान, निर्भीक और कर्तव्य परायण होने के गुणों का सटीक चित्रण लेखक और निर्देशक ने मिलकर किया है. स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि का समानुपातिक वर्णन करते हुए भी फिल्म पूरी तरह झांसी की रानी के मुख्य किरदार पर केन्द्रित बनी रहती है.
रानी लक्ष्मीबाई का झलकारी बाई से मिलना और नंदू को अंग्रेजों के पास से छुड़ाकर वापस लाना, अंग्रेजो से रविवार की छुट्टी को कामकाज में बदलने की तार्किकता, दामोदर का विछोह और आनंद राव को गोद लेने तथा गंगाधर की मौत के बाद मनु के मणिकर्णिका बनने के प्रसंग बखूबी फिल्माए गए हैं. पति की मौत के बाद लक्ष्मीबाई जिस दृढ़ता से वैधव्य त्यागकर राज सिंहासन सम्हालती है और झांसी की रक्षा का संकल्प लेती है, बेहद प्रभावी है. अंग्रेजों द्वारा रानी को महल से बेदखल किये जाने का प्रसंग, सदाशिव राव की गद्दारी, ग्वालियर किले पर रानी का कब्ज़ा और मराठा साम्राज्य की स्थापना सहित क्लाइमेक्स में अंग्रेजों की तीन गुना ताकतवर फ़ौज से लोहा लेने की जंग के दृश्य भी कमाल के हैं.
अभिनय की दृष्टि से कंगना रनौत पूरी फिल्म में छाई हुई हैं. मणिकर्णिका के वैभव का पूरा दारोमदार कंगना के अभिनय सामर्थ्य की कसौटी पर टिका था, जिस पर वे अभिनय और निर्देशन की दोहरी जिम्मेदारी के बावजूद खरी उतरी हैं. सहायक भूमिकाओं में अंकिता लोखंडे, डेनी डेनजोंग्पा, सुरेश ओबेरॉय, कुलभूषण खरबंदा आदि का काम साधारण स्तर का है. अमिताभ बच्चन का वाइस ओवर तथा शंकर अहसान लॉय का संगीत असरदार है. राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत ‘देश से है प्यार तो हर पल ये कहना चाहिए..’ गीत उम्दा बन पड़ा है.
प्रसून जोशी के संवाद फिल्म का ओज बढाते हैं- नाना साहब ऐसे टिमटिमाओगे तो आँधी में बुझ के रह जाओगे.. कन्याएं कैसे कलाईयाँ घुमाती हैं मैं दिखाती हूँ.. तात्या जो भी छबीली से तलवार छीनेगा उसे हमारा हाथी इनाम में मिलेगा.. झांसी को मणिकर्णिका का इंतज़ार रहेगा.. अरे पंडितजी ये कैसी ढीली गाँठ बाँधी है हमें तो सात जन्मों तक चलनेवाली चाहिए.. वर्ड्स विदाउट कल्चर हैव नो मीनिंग.. अगर हाथों में किस्मत की लकीरें न हो तो चाकू से लिख देनी चाहिए.. झांसी के सिंहासन पर सिर्फ वीरों का अधिकार है, लालचियों का नहीं.. झांसी में तो पचास साल से सूर्य उदय तक नहीं हुआ.. विवाह के दिन एक रस्म निभाई थी आज कर्तव्य निभा रही हूँ.. अन्याय से न्याय की उम्मीद कर रहीं थीं आप.. हम इसलिये लड़ रहे हैं कि खुद पर नाज़ कर सकें.. आप आज के लिये नहीं कल के लिये लड़ रहीं हैं.. यह भारत है यहाँ जो सब कुछ छोड़कर खड़ा है वही बड़ा है.. क्रांति और कत्लेआम में फर्क होता है.. हमारी संस्कृति में पहले शांति और फिर क्रांति को जगह दी गई है.. जब बेटी उठ खड़ी होती है तब विजय और बड़ी होती है.. अगर अपनों से ही हार गए तो शत्रु से जीत कर क्या करेंगे.. आज़ादी का संग्राम बलिदान मांगता है.. ०००

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