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विश्व हिन्दी सम्मेलनों से हिन्दी का कितना भला

हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर विशेष

  • विनोद नागर

(लेखक भोपाल व मॉरीशस के विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग ले चुके वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.)

1975 से विश्व हिन्दी सम्मेलन के नाम पर दुनिया भर में हिन्दी का डंका बजाने की कवायद हर तीसरे साल की जाती रही है. हाल में मॉरीशस में संपन्न ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी प्रकारांतर से वही सब हुआ, जो इससे पहले के सम्मेलनों में होता आया है. 2015 में भोपाल में हुआ सम्मेलन ‘हिन्दी जगत: विस्तार और संभावनाएं’ विषय पर एकाग्र था. जबकि पिछले महीने मॉरीशस में संपन्न 11 वाँ सम्मेलन ‘हिन्दी विश्व और भारतीय संस्कृति’ पर केन्द्रित रहा.

 

तीन दिवसीय सम्मेलन के लिये पाई स्थित आयोजन स्थल को सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया था. स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र को गोस्वामी तुलसीदास नगर का नाम दिया जाना मॉरीशस में रामायण के महत्त्व को प्रतिपादित करता है. मुख्य सभागार का नाम मॉरीशस के विश्व प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार (स्व.) अभिमन्यु अनत के नाम पर रखा जाना उनके प्रति श्रद्धा का परिचायक था. सामानांतर सत्रों के लिये बनाये गये कक्ष भी मणिलाल डॉक्टर, भानुमति नागदान, सुरुजप्रसाद मंगरभगत, रायकृष्णदास, महावीरप्रसाद द्विवेदी, पं.नरदेव वेदालंकार, विक्रमसिंह रामलाला जैसे मूर्धन्य हिन्दी सेवियों और विद्वानों के नाम से सुशोभित थे. एक कक्ष हाल में दिवंगत गोपालदास नीरज के नाम पर भी रहा.

 

तीन दिनों के सम्मेलन के उत्साह पर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटलबिहारी वाजपेयी के निधन से उपजे शोक की लहर छायी रही. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि हिन्दी के प्रबल पैरोकार के रूप में अटलजी का विश्व हिन्दी सम्मेलन तथा मॉरीशस के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के विकास में विशिष्ट योगदान रहा तभी तो भारत में राष्ट्रीय शोक के दौरान मॉरीशस में भी दोनों देशों के झंडे झुके रहे. सम्मेलन के शुभारम्भ के फ़ौरन बाद निर्धारित सत्र को स्थगित कर उसे अटलजी की श्रद्धांजलि सभा में तब्दील कर दिया गया.

 

उदघाटन समारोह में मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण जगन्नाथ ने स्थानीय साइबर सिटी में नवनिर्मित साइबर टावर का नाम अटलजी के नाम पर करने की घोषणा की. सम्मेलन में तीनो दिन पूरे समय मौजूद रहे पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने भी मॉरीशस और हिन्दी की विकास यात्रा में अटलजी के योगदान का भावुक स्मरण किया. समापन समारोह में मॉरीशस के राष्ट्रपति परमसिवम पिल्लई वैयापुरी ने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को सातवीं आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के भारत के प्रयासों का पुरजोर समर्थन जारी रखने की बात कही.

 

सम्मेलन में भारत के सुभाष कश्यप, सी. भास्कर राव, प्रसून जोशी, सुरेश ऋतुपर्ण, प्रेमशंकर त्रिपाठी, ऋता शुक्ल, चमनलाल गुप्त, श्रीधर पराड़कर, केसी अजय कुमार, अजय पटनायक, तम्जनसोबा आओ, जोरमअनिया ताना को ‘विश्व हिन्दी सम्मान’ से नवाज़ा गया. मध्य प्रदेश के प्रो. रमेश चन्द्र शाह तथा मालती जोशी इस सम्मान को ग्रहण करने के लिये समारोह में उपस्थित नहीं हो सके. विदेशों में हिन्दी की सेवा कर रहे 14 अन्य लोगों को भी यह सम्मान मिला. भारत में सूचना प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स और सम्बद्ध क्षेत्रों में अनुसंधानरत पुणे की स्वायत्त वैज्ञानिक संस्था सी-डेक को भी संस्थागत श्रेणी में विश्व हिन्दी सम्मान प्राप्त हुआ. सम्मेलन का प्रतीक चिन्ह (लोगो) इन्दौर के युवा ग्राफिक डिज़ाइनर रुचित यादव ने तैयार किया था. इसमें उन्होंने भारत और मॉरीशस के राष्ट्रीय पक्षी मोर तथा डोडो के माध्यम से दोनों देशों की मैत्री को कलात्मक ढंग से सजाया. उन्हें सम्मेलन में सम्मानित भी किया गया.   

 

सम्मेलन में बीस देशों के दो हज़ार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. साहित्यकार होने के नाते विशेष आमंत्रित के रूप में भारत से गए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी तथा गुजरात की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने सम्मेलन में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कुछ महत्वपूर्ण सत्रों की अध्यक्षता भी की. सम्मेलन के कुछ सत्रों में चल रहे विमर्श को विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने सामान्य प्रतिभागियों के बीच बैठकर ध्यान से सुना. विदेश मंत्रालय के दोनों राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह और एम जे अकबर के अलावा गृह राज्य मंत्री किरण रिजुजू भी सम्मेलन में हर समय सक्रीय बने रहे. उन्होंने राजभाषा विभाग द्वारा संयोजित प्रौद्योगिकी के भविष्य विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता भी की. सम्मेलन के प्रदर्शनी खंड में मध्यप्रदेश ग्रन्थ अकादमी ने भी अपना स्टाल लगाया.

 

    सम्मेलन के कुल आठ सत्रों में भाषा और लोक संस्कृति के अंतर्संबंध, हिन्दी शिक्षण में भारतीय संस्कृति, हिन्दी साहित्य में संस्कृति चिंतन, फिल्मो के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण , संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति, प्रवासी संसार: भाषा और संस्कृति तथा हिन्दी बाल साहित्य और भारतीय संस्कृति विषय पर गहन विचार विमर्श हुआ. पर समुचित तालमेल के अभाव और अव्यवस्थाओं के चलते वक्ता और श्रोताओं का काफी समय स्थान खोजने में गया. एक साथ चार चार सामानांतर सत्र रख दिए जाने से श्रोताओं को बहुआयामी विमर्श का पूरा लाभ नहीं मिल सका. उद्घाटन एवं समापन समारोह का संचालन भी उहापोहभरा रहा. मंच पर एक ही डायस से दो उद्घोषिकाओं द्वारा हिन्दी अंग्रेजी में बारी बारी से किये जा रहे संचालन और पृष्ठभूमि में एलईडी स्क्रीन पर उभरती तस्वीरों/ कैप्शन में समुचित तालमेल का अभाव खटकने वाला था. सम्मेलन के दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम और कवि सम्मेलन में लोगों ने कम रूचि दिखाई.

 

भोपाल की तरह मॉरीशस का विश्व हिन्दी समेलन भी अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया. हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाये जाने की करोड़ों भारतीयों की अभिलाषा आज भी मन की टीस बनी हुई है. जब भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए 177 देशों का समर्थन जुटाया जा सकता है, तो हिन्दी को मान्यता दिलाने में 129 देशों की सहमति हासिल करने में आ रही अड़चन भी सुनियोजित प्रयासों से दूर की जा सकती हैं. फिजी के अगले विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए इससे बड़ा तोहफा और क्या होगा..!

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