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स्पीड ब्रेकर पर पलटा सत्ता की अकर्मण्यता का रथ


विनोद नागर

खिर जो कयास टीवी चैनलों की चकल्लस, गली मोहल्लों की चर्चा, सट्टाबाजार के भावताव और एक्जिट पोल के पूर्वानुमान से लगाये जा रहे थे, उसका खुलासा मंगलवार को खुली हवा में साँस लेती ईवीएम से झरे वोटों की गिनती ने भी कर दिया। देश के हृदयस्थल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मतदाताओं ने अपने राज्यों में सत्तारुढ़ दल से मोहभंग का तगड़ा झटका देकर पूरे देश को कांग्रेस मुक्त बनाने का आह्वान करनेवाली पार्टी को खुद सकते में ला दिया।
पिछले आम चुनाव में ऐतिहासिक विजय हासिल कर प्रचंड बहुमत से केन्द्र में राज सुख भोग रही भाजपा ने चार सालों में देश के कई राज्यों में भी येन केन प्रकारेण सत्ता में आने के मंसूबे पूरे किये। ऐसा करते हुए उसे जरा भी अहसास नहीं हुआ कि जिन राज्यों में वह वर्षों से सत्ता में काबिज है, वहाँ एक ही चेहरे से लोग ऊब गये हैं और अकर्मण्यता की भूमिगत दीमकों ने सिंहासन के नीचे की जमीन को खोखला कर दिया है।
दरअसल दीमकों से होने वाला विनाश सतह पर सबसे आखीर में उभरकर सामने आता है। भोला भाला मासूम किसान जब लेतलाली छोड़ खेत में पहुंचा तब तक चिडिय़ा खेत चुग चुकी थी। अब सिर पीटने से सहानुभूति ही मिल सकती है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अगर भाजपा ने समय रहते नेतृत्व के नये चेहरे तलाश लिए होते तो बहुत मुमकिन है कि परोसी हुई थाली से हाथ धोने की नौबत न आती। महीनों तक रात दिन एक कर विधानसभा क्षेत्रों में निकाली जन आशीर्वाद यात्रा में मिले आशीर्वाद से फूले न समाने वाले भोले भंडारी के अतिआत्मविश्वास को प्रदेश की होशियार जनता ने धता बताने में कोई कसर न छोड़ी।
नि:संदेह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने झंझावात से जूझ रही कांग्रेस पार्टी को अपनी उखड़ती जड़ें जमाने का फिर एक मौका दे दिया है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में 2018 का यह जनादेश कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राजनैतिक दलों को कहीं न कहीं यह संदेश भी दे रहा है कि सत्ता में आने के बाद यदि उन्होंने ‘मध्यप्रदेश शासन’ को ‘दिग्गी सरकार’ या ‘शिवराज सरकार’ में बदलने की गलती दोहराई तो बेलगाम नौकरशाही ‘गुड गवर्नेंस’ के जुमले को कभी भी व्यावहारिक धरातल पर उतरने नहीं देगी और सत्ता बदलने के बाद भी सरकार का असली चेहरा नहीं बदलेगा।
विकास के नये नारों और लुभावने वादों को पूरा करने का भरोसा दिलाकर सत्ता में लौटे राजनैतिक दल को यह बात गंभीरता से समझ लेनी चाहिए कि मध्यप्रदेश की सवा सात करोड़ जनता अब आपसे अपने वोट के बदले ‘रिजल्ट’ चाहती है। सिर्फ मंहगी गाडिय़ों में घूमने, पसंदीदा अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग कराने, हितैषियों को ठेके दिलाने या पुलिस और प्रशासन में अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाले नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपेक्षित मान सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता शायद ही मिले।
सत्ता परिवर्तन की बयार पर सवार होकर आये नये जनादेश के बाद यदि लोग उम्मीद करें कि सीहोर, रायसेन और विदिशा का दौरा भी हेलीकॉप्टर से करनेवाले तथा श्यामला हिल्स, चौहत्तर बंगले या चार इमली से सरकार चलाने वाले सत्ताधीशों का रवैया बदलेगा और वे मंत्रालय में बैठकर सरकारी मशीनरी को परिणाममूलक बनाने के ठोस उपाय करेंगे तो वोट की यह कीमत चुनाव कराने में खर्च हुए सरकारी धन को निहाल करेगी। जनादेश के जरिए लोगों ने एक बार फिर राजनीति को सुधरने का मौका दिया है अब मरजी है आपकी..।
चुनाव में भूली मर्यादा का प्रायश्चित करते हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित पत्रकारवार्ता में अपनी पार्टी की जीत से प्रफुल्लित राहुल गांधी ने बड़ी सहजता से कह दिया कि अपने धुर विरोधी की तरह वे अपने मुख से भाजपा मुक्त भारत की बात कभी नहीं कहेंगे। इंच टेप से सीने की नापजोख करनेवालों के लिए यह छोटे मुंह बड़ी बात हो सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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